poetry in urdu.......कैसे मैं हल्का करता उसका बोज जब खुद ही उठा रखा था
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poetry in urdu.......कैसे मैं हल्का करता उसका बोज जब खुद ही उठा रखा था



कुछ नही हुवा बस शाम तो ढली है 

दिल टुटा है क्या 

बरसात भी हुई है

ना चाहते हुए 

आंखे भी तो भीगी है 

तुम्हे देख कर आज फिर 

मोहब्बत जागी  है

कितना परेशांन रहा वो 

शक्श जो एक इंसान को 

तरसा हो 

मेरा वो दिल तिल तिल तडपा हो 

कदर ना करी उसने मेरी 

जो आज इस तरह 

दिखा है 

कितना मुश्किल रहा वो पल 

हर लम्हों से भरी लगा वो पल 

कैसे मैं हल्का करता उसका बोज 

जब खुद ही उठा रखा था 

मेने वो दर्द 

ना मैं मिला उसे 

ना बिछड़ पाया 

कही राह में रह गई 

मोहब्बत हमारी 

हर शक्श उसे देख पाया 

मेरा दिल ना फिर किसी से 

जुडा ,वाही रस्ते में बिखरा पड़ा रहा 

वक़्त गुजरता रहा 

हालत ना बदल पाया 

में तुम्हे चाह्ता था और 

चाहता ही रह गया  

                               Hasi Rana💕

  

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