तुम्हे देख कर हर रोज यही सोचता हु की तुम्हे में क्यों सोचता हु ............ Romentic Hindi Poetry
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तुम्हे देख कर हर रोज यही सोचता हु की तुम्हे में क्यों सोचता हु ............ Romentic Hindi Poetry



बिखरी जुल्फे आँखों में काजल 

ये बेबाक सी निगाहे 

उल्जनो से भरे अधर 

बस इन मे ही खोने की ख्वाश मेरी 

मुझे हर रोज तुम्हारे करीब लती है 

ये उठती पलके ये नैनो के तीर 

हर रोज मुझे कहते है

कुछ तो है जो यु होस खो रहे है 

बहो मे तुम्हारी मदहोश होने को केहते है  

मदहोशी भी एसी जिस मे आदमी ना उभर सके ना डूब सके 

फिर सोच ता हु ऐसे इश्क को कोन संभाले 

जिस में आदमी ना जी सके ना मर सके

तुम्हे देख कर हर रोज यही सोचता हु 

की तुम्हे में क्यों सोचता हु 

                                                       Radhe...


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